इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में पुस्तक ‘खामोश लड़कियाँ पर विशेष परिचर्चा एवं विमोचन समारोह

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दिल्ली, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक चेतना के संगम के रूप में स्थापित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के जनपद संपदा विभाग द्वारा अपनी चर्चित पुस्तक चर्चा श्रृंखला ‘ज्ञानपथ’के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण साहित्यिक परिचर्चा का आयोजन किया । इस श्रृंखला के अगले सोपान के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय में मीडिया की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सीमा भारती की नवीनतम कृति ‘खामोश लड़कियाँ’ पर केंद्रित एक विशेष परिचर्चा एवं पुस्तक विमोचन समारोह का आयोजन किया गया ।
आयोजन दिनांक 23 अक्टूबर 2026, शुक्रवार को सायं 5:00 बजे, उमंग महाविद्यालय कक्ष, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, जनपथ रोड, नई दिल्ली में संपन्न हुआ ।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र निरंतर साहित्यिक विमर्श, वैचारिक संवाद और संवेदनशील सामाजिक सरोकारों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। ‘ज्ञानपथ’ इसी प्रतिबद्धता का एक सशक्त माध्यम है, जिसके माध्यम से समकालीन साहित्य, समाज और संस्कृति के अंतर्संबंधों पर गंभीर मंथन किया जाता है। इस बार ‘ज्ञानपथ’ ने जिस पुस्तक को अपने विमर्श का केंद्र बनाया है, उसका शीर्षक ही अपने आप में एक गहरा प्रश्न और आधी आबादी के मौन रह जाने की बात कहती है – ‘खामोश लड़कियाँ’।

खामोश लड़कियाँ’ केवल एक कविता की पुस्तक नहीं, बल्कि हमारे समाज के उस हिस्से का दस्तावेज है जिसे अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। लेखिका\ कवियत्री डॉ. सीमा भारती ने इस कृति में स्त्री-अनुभवों, उनकी खामोशी के पीछे छिपे संघर्ष, उनकी आकांक्षाओं और सामाजिक संरचनाओं के बीच उनके अस्तित्व की जद्दोजहद को अत्यंत संवेदनशीलता और प्रामाणिकता के साथ उकेरा है।उन्होंने कई ऐसी कवितायें भी लिखी हैं जिनके विषय आम तौर पर स्त्रियों द्वारा नहीं चुने जातें हैं ।यह पुस्तक उन लड़कियों के मन की बात कहती है जो घर, परिवार, समाज और परंपराओं के बीच अपनी पहचान तलाश रही हैं। उनकी खामोशी कमजोरी नहीं, बल्कि एक प्रतिरोध है, एक प्रतीक्षा है, और कभी-कभी एक गहरा संवाद भी है जिसे सुनने की आवश्यकता है। डॉ. भारती ने लोक-अनुभवों, मौखिक परंपराओं और जनपदीय संवेदनाओं को साहित्यिक दृष्टि से पिरोकर इस विषय को एक नया आयाम दिया है।

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इस विशेष अवसर पर साहित्य, अकादमिक और सामाजिक चिंतन से जुड़े प्रतिष्ठित विद्वान, समालोचक और लेखकगण उपस्थित रहें। पुस्तक का विमोचन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय ने किया । वही इस आयोजन के मुख्य अतिथि भी रहे
अध्यक्षीय वक्तव्य के लिए , प्रख्यात आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष गोपेश्वर सिंह ने संग्रह के शीर्षक को गहरा और संवेदनशील बताते हुए, कहा बड़े बड़े लेखक वही होते है जो जीवन की समग्रता में गहराई से उतरते हैं। उन्होंने आगे कहा धूमिल के अनुसार कविता ज़माने के कटघरे में खड़े बेक़सूर आदमी का हलफनामा है इस लाइन के अनुसार हर कवि अपने समय में बेक़सूर आदमी का हलफनामा दर्ज करता है । सभी महत्वपूर्ण कवियों ने अपने -अपने तरीके से अपने समय में यह हलफनामा दर्ज करने की कोशिश की। यह कोशिश सीमा की कविताओं में भी दिखाई देती है । खामोश लड़कियां संग्रह की अधिकांश कविताओं में स्त्री नए ढंग से अपने को अभिव्यक्त करती दिखाई देती है| बहुतेरी कविताओं के उदहारण दिए जा सकते हैं लेकिन यहाँ “न्यायविद” शीर्षक कविता को सामने रखा जा सकता है । यह पूरी पितृसत्ता को रेखांकित करती कविता है । कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में ही स्त्री का हाहाकार भरता हुआ मन है जिसे कोई नहीं देख पाता। ऐसे अन्य कई प्रसंग है जिसमे सीमा जी स्त्री जीवन के तल्ख़ हकीकत को नए ढंग से बयां करती हैं। कोई भी नया कवि अपनी मौलिकता में कुछ नए बिम्ब और काव्यभाषा लेकर आता है । वह अपने सच को नयी काव्यभाषा और नए बिम्बो में प्रकट करता है ।

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संग्रह की एक कविता जिसमे हरित भाषा शब्द आया है अपने आप में अनूठा है । उस कविता के अंतिम पंक्तियों को देखना चाहिए ” पृथ्वी की हरित भाषा में कई बार लिखी होती हैं जिन्दा इबारते , जिन्हे तुम आँखों से छू भर सकते हो समझ नहीं सकते , मेरे इंतज़ार की तरह ।” इसमें स्त्री का शताब्दियों का लम्बा इंतज़ार है जिसे वह पृथ्वी की हरित भाषा में कह रही है ।

इसके पश्चात् दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के डीन प्रो. अनिल कुमार राय ने कहा की इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य साहित्य के माध्यम से समाज, संवेदना और स्त्री-अनुभवों को गहराई से समझना और विचारों का सार्थक आदान-प्रदान करना है। यह आयोजन न केवल पुस्तक के पाठ का उत्सव है , बल्कि उन सभी खामोश आवाजों को सुनने का एक प्रयास भी है जो हमारे आसपास मौजूद हैं। संग्रह की सामाजिक अंतर्दृष्टि और काव्यात्मक संवेदना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लेखिका ने समाज का सूक्ष्म एवं गहन अध्ययन करने के बाद इन कविताओं की रचना की है। भाषा के अभिनूतन प्रयोगों के बारे में प्रो. अनिल कुमार राय ने भी बात की । उन्होंने कहा कि सीमा भारती की भाषा और बिम्ब की प्रयोगधर्मिता वाकई अद्भुत है , वह ” पृथ्वी की त्रिज्या” शीर्षक कविता कि पंक्तियाँ ” कैसे जान पाती हैं तितलियाँ , कि फूलों से भी सुन्दर है उनके खुद कि पंखुरियाँ ” का उदहारण देते हैं।

प्रख्यात स्त्रीवादी चिंतक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र की प्रो. गरिमा श्रीवास्तव जी ने कहा कि 21वीं सदी की इस उथल-पुथल भरी जिंदगी में, जहाँ स्त्रियां परिवार, करियर और समाज की अपेक्षाओं के बीच मल्टीटास्किंग कर रही हैं, उन्हें अपने मन की बात कहने या अपने पसंदीदा व्यक्ति से बात करने की फुर्सत भी नहीं मिलती है। उनकी खामोशी असल में असहमति, अनिच्छा, और दमन का परिचायक है, जिसे अक्सर मधुरता से मुस्कान के पीछे छिपा लिया जाता है। वक्ता ने कहा कि अगर कोई स्त्री सचमुच बेबाकी से बोलना शुरू कर दे, तो शायद सामाजिक ढांचा ही चरमरा जाएगा। इसलिए, यह मौन कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सामाजिक विसंगतियों और अपेक्षाओं के बीच एक तरह का प्रतिरोध है।
इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए प्रख्यात कवि, कथाकार और व्यंग्य के सिद्धहस्त शिल्पी श्री रणविजय राव जी ने कहा कि समारोह में वक्ताओं ने डॉ. सीमा भारती के काव्य संग्रह को स्त्री संवेदना, मानवीय जिजीविषा और सामाजिक विसंगतियों का प्रामाणिक दस्तावेज बताया।आगे चर्चा में यह स्पष्ट किया गया कि पारंपरिक समाज अक्सर स्त्री की खामोशी को उसकी दुर्बलता मान लेता है, लेकिन इस कृति में यह मौन कोई लाचारी नहीं, बल्कि प्रतिरोध और गरिमा की एक सशक्त भाषा है। ‘कस्बाई लड़कियाँ’ और ‘तुम्हारा इंतज़ार’ जैसी कविताओं के माध्यम से लेखिका ने आधुनिक आभासी दुनिया के छद्म, प्रेम की साधना और महिलाओं के आत्मसम्मान की जद्दोजहद को अत्यंत गहराई से उकेरा है।
इसके पश्चात प्रबुद्ध युवा विद्वान और रामलाल आनंद कॉलेज के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. गोपाल यादव जी ने काव्य संग्रह पर विचार रखते हुए कहा कि यह कृति सामाजिक वर्जनाओं पर सीधा प्रहार करती है। आधुनिक युग में स्वतंत्रता के बड़े दावों के बावजूद, स्त्रियों के लिए यह दायरा हमेशा सीमित और नियंत्रित रहा है। लड़कों से अधिक समझदार होने के बावजूद, पारिवारिक व सामाजिक बंधनों के कारण लड़कियाँ सेना के शीर्ष पदों (जैसे फील्ड मार्शल) के बजाय अक्सर शिक्षिका या डांसर बनने तक सीमित रह जाती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि लड़कियों की यह खामोशी केवल मौन नहीं, बल्कि बड़े बदलावों और नई पहचान गढ़ने की असली ताकत है।
कार्यक्रम की अंतिम कड़ी के रूप में आगे बढ़ते हुए माता सुंदरी कॉलेज के हिंदी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी विद्वानों, अध्यापको और विद्यार्थियों को कार्यक्रम में आने के लिए तहे दिल से आभार व्यक्त किया और कार्यक्रम को समाप्त किया।

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जनपद संपदा विभाग, जो लोक-संस्कृति, लोक-परंपरा और जन-ज्ञान के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए कार्य करता है, के लिए यह पुस्तक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जनपद की बेटियों के मौन को वाणी देने का कार्य करती है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने इस अवसर पर सभी साहित्य प्रेमियों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, पत्रकारों और प्रबुद्ध नागरिकों को सादर आमंत्रित किया। आयोजकों का मानना है कि श्रोताओं की उपस्थिति और उनकी सक्रिय भागीदारी इस आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान करती है और विमर्श को और अधिक समृद्ध बनाने में अपना योगदान देती है
इस अवसर पर जनपद संपदा विभाग के विभागाध्यक्ष के. अनिल कुमार ने कहा कि परिचर्चा का उद्देश्य साहित्य के माध्यम से समाज, संवेदना और स्त्री-अनुभवों को गहराई से समझना तथा विचारों के सार्थक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना है।
डॉ. सीमा भारती का काव्य-संग्रह ‘खामोश लड़कियाँ’ स्त्री-जीवन के उन अनुभवों, आकांक्षाओं और संघर्षों को स्वर देता है, जिन्हें अक्सर सामाजिक अपेक्षाओं और पारिवारिक संरचनाओं के बीच अनसुना कर दिया जाता है। संग्रह की कविताएँ स्त्री की पहचान, प्रेम, इच्छाओं और आत्माभिव्यक्ति के प्रश्नों को संवेदनशीलता के साथ सामने लाती हैं। पुस्तक का शीर्षक स्वयं इस प्रश्न को जन्म देता है कि समाज में स्त्री की आवाज़ को किस प्रकार देखा जाता है और उसकी चुप्पी के पीछे कौन-सी सामाजिक परिस्थितियाँ काम करती हैं।

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